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माता-पिता है आईना, और बच्चे उनका अक्स

(एक साधारण सी बात, विशेष तौर पर युवा पता-पिता के लिए..)

(A food for thought, specially for young parents..)

हम माता पिता को अक्सर शिकायत करते सुनते है कि हमारा बच्चा बहुत टीवी देखता है या वो दिनभर मोबाइल पर गेम खेलता रहता है. प्रश्न ये है कि किसने बताया उसे टीवी क्या होती है और मोबाइल क्या है? जबसे उसका जन्म हुआ तब से उसने आपको और परिवार के बाकि सदस्यों को टीवी देखते देखा. याद कीजिये क्या कोई दिन ऐसा गया जब आपने टीवी नहीं देखी हो? जब वो थोड़ा बड़ा हुआ, आपने ही उसे कार्टून दिखाया. आप टीवी देखते है नियम से रोज, यही अब वो भी करना चाहता है, तो अब आप कैसे रोकेंगे? आप खुद टीवी नहीं छोड़ सकते, तो उससे ऐसा करने को कैसे कहेंगे, और वो क्यों मानेगा? ऐसे ही मोबाइल का उदहारण है, जब से उसने आँख खोली है, सभी को वो मोबाइल मैं कुछ न कुछ करते देख रहा है. कोई फोटो ले रहा है, तो कोई चैट कर रहा है. ये दृश्य भी आम है कि माता या पिता अपने साल भर या उसे भी छोटे बच्चे को स्ट्रोलर मे ले कर घूमने निकले है और मोबाइल पर बात कर रहें है, बच्चा अपनी गाडी मे बैठा चुप चाप. वो चाहता है आप उससे बात करे, पर आप मोबाइल मे लीन है. जब वो थोड़ा समझने लायक हुआ तो आपने ही उसे मोबाइल पकड़ा दिया कि वो मोबाइल मे व्यस्त रहे और आप अपना काम या आराम कर सके. यदि ऐसा है तो और बड़े होने पर जब वो मोबाइल मे गेम खेलेगा तो आप कैसे मना करेंगे?

बच्चों के लिए मातापिता एक आईने के समान होते है जिनमे वो अपना अक्स देखते है. जराfaulty parenting सोचिए यदि आईने में दाग हो तो क्या होगा? स्वावभिक है अक्स मैं भी दाग दिखेगा. उसी प्रकार यदि मातापिता मैं अवगुण है, तो उनका असर बच्चों पर भी आएगा. जब मातापिता सुलझे विचारों के हो, सुखी हो, संतुष्ट हो, तो बच्चों में भी सकारात्मकता आएगी. लेकिन यदि मातापिता ही चिड़चिड़े हो, क्रोध, लालच, अहंकार, घृणा से भरे हो, तो वे अपने बच्चों से ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते है? यदि आप चाहते है की आपके बच्चे संस्कारी बने, तो पहले आपको सही संस्कार सीखने होंगे, अपनाने होंगे. याद रखे बच्चों के पास देखने समझने की अद्भूत क्षमता है. वो ज्यादातर व्यवहार अपने आसपास से देख कर सीखते है. हो सकता है आप का बच्चा थोड़ा चिड़चिड़ा हो, जिद्दी हो. आप सोचेंगे हम तो इससे हमेशा प्यार से बात करते है, डांटते भी नहीं. फिर ये ऐसा क्यों करता है? आप ये याद करे क्या आप हमेशा उसके सामने खुश रहते है? कहीं आप उसके सामने अपनी चिड़चिड़ाहट तो नहीं निकालते? कहीं आप पतिपत्नी आपस मैं तो झगड़ा नहीं करते? आप के घर का वातावरण कैसा है? आप के पास से नकारात्मक ऊर्जा तो नहीं निकलती? (नकारत्मक ऊर्जा हमारे मस्तिष्क मैं आने वाले नकारात्मक विचारो से उत्पन्न होती है ) और ऐसा बहुत कुछ हो सकता है! सोचिये ! बच्चे शब्दो से ज्यादा मन की भावनाओं को समझते है, आपके मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा को समझते है. आप को देख के, आप से ही वो सीखता है. जैसी आदतें आप में हैं, वैसी ही उसमे भी आएँगी. खुद अच्छी आदतों को अपनाएं, अच्छे संस्कारों को अपनाएं. साफ़ मन से, सकारात्मक विचारो के साथ बच्चे के साथ समय बिताएं. अपने मन दर्पण को चमकाए, देखिये कैसे आपका अक्स, आपका बच्चा भी झिलमिला उठेगा..

भवदीय

तपन पंडित

काउन्सलिंग  साइकोलोजिस्ट, गाइडपोस्ट

(सेण्टर  फॉर  काउन्सलिंग एंड  पर्सनलाइज्ड  ट्रेनिंग)

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